भगवान कहते हैं — जो इस हम दोनों के धर्म-संवाद (गीता) का पाठ करे — वह ज्ञान-यज्ञ से मेरी पूजा करता है — यह मेरा मत है।
गीता-पाठ को यज्ञ कहा गया है। यज्ञ का अर्थ है — समर्पण। जो गीता पढ़े, समझे और जिए — वह परमात्मा की पूजा कर रहा है।
भगवान कहते हैं — जो इस हम दोनों के धर्म-संवाद (गीता) का पाठ करे — वह ज्ञान-यज्ञ से मेरी पूजा करता है — यह मेरा मत है।
गीता-पाठ को यज्ञ कहा गया है। यज्ञ का अर्थ है — समर्पण। जो गीता पढ़े, समझे और जिए — वह परमात्मा की पूजा कर रहा है।
'ज्ञानयज्ञ' — ज्ञान से की गई पूजा। गीता 4.33 में कहा था — 'सब यज्ञों में ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है।' यहाँ वही बात फिर आती है।
गीता पढ़ना — यह कर्मकांड नहीं, यह ज्ञान-यज्ञ है। यही इसे अन्य ग्रंथों से अलग बनाता है।