📿 श्लोक संग्रह

न च तस्मान्मनुष्येषु

गीता 18.69 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥
न च तस्मात्
उससे अधिक
मनुष्येषु
मनुष्यों में
कश्चित्
कोई भी
मे प्रियकृत्तमः
मुझे सबसे प्रिय करने वाला
भविता न च
और न होगा
प्रियतरः
अधिक प्रिय
भुवि
पृथ्वी पर

भगवान कहते हैं — गीता को सुनाने वाले से अधिक प्रिय मुझे मनुष्यों में कोई नहीं — और न होगा। यह प्रेम का परम वचन है।

जो भगवान के ज्ञान को आगे बढ़ाए, वह भगवान का सबसे प्रिय। यह एक गहरी बात है — भक्ति केवल अपने लिए नहीं, दूसरों को भी देना — यही परम-भक्ति का फल है।

यह श्लोक 18.68 के साथ जोड़कर पढ़ना चाहिए। ज्ञान-वाहक को मुक्ति और प्रेम — दोनों मिलते हैं।

'भुवि' — पृथ्वी पर — यह शब्द दर्शाता है कि यह प्रेम इस जीवन में, इस संसार में भी है।

अध्याय 18 · 69 / 78
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