📿 श्लोक संग्रह

य इमं परमं गुह्यम्

गीता 18.68 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥
परमम् गुह्यम्
परम गुह्य — सर्वोच्च रहस्य
मद्भक्तेषु
मेरे भक्तों में
अभिधास्यति
कहेगा — सुनाएगा
भक्तिम् मयि पराम्
मुझमें परम भक्ति करके
माम् एव एष्यति
मुझे ही पाएगा
असंशयः
निःसंदेह — संदेह नहीं

भगवान कहते हैं — जो व्यक्ति इस परम गुह्य ज्ञान को मेरे भक्तों में सुनाएगा — वह मुझमें परम भक्ति करके मुझे ही पाएगा — इसमें संदेह नहीं।

गीता-प्रचार को स्वयं भगवान ने यहाँ आशीर्वाद दिया है। जो इस ज्ञान को पात्र लोगों तक पहुँचाए — वह भी मुक्त होता है।

यह श्लोक गुरु-परंपरा का आधार है। ज्ञान को आगे बढ़ाना — यह भी एक महान कर्म है।

'असंशयः' — बिना संदेह। भगवान यहाँ कोई शर्त नहीं रखते। जो सुनाए — वह पाए। यह सरल नियम है।

अध्याय 18 · 68 / 78
अध्याय 18 · 68 / 78 अगला →