संजय कहते हैं — व्यास की कृपा से मैंने यह परम गुह्य योग — जिसे योगेश्वर कृष्ण ने स्वयं कहा — प्रत्यक्ष सुना।
यह कृतज्ञता का वचन है। संजय महर्षि व्यास को धन्यवाद देते हैं जिनकी कृपा से उन्हें दिव्य-दृष्टि मिली। और उस दृष्टि से उन्होंने यह अमृत-वचन सुना।