📿 श्लोक संग्रह

मन्मना भव मद्भक्तो

गीता 18.65 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
मन्मनाः
मन मुझमें लगाओ
मद्भक्तः
मेरे भक्त बनो
मद्याजी
मेरी यज्ञ-पूजा करो
माम् नमस्कुरु
मुझे नमस्कार करो
माम् एव एष्यसि
मुझे ही पाओगे
सत्यम् प्रतिजाने
सत्य वचन देता हूँ — प्रतिज्ञा करता हूँ
प्रियः असि मे
तुम मुझे प्रिय हो

भगवान का परम वचन — मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे यज्ञ करो, मुझे नमस्कार करो — तुम मुझे ही पाओगे। यह मेरी सत्य प्रतिज्ञा है — तुम मुझे प्रिय हो।

यह चार-भाव भक्ति का सार है — मन, भक्ति, पूजा, प्रणाम। और परिणाम — 'मामेवैष्यसि' — तुम मुझे ही पाओगे। यह गारंटी है। और अंत में 'प्रियोऽसि मे' — तुम प्रिय हो।

यह श्लोक गीता 9.34 का लगभग शब्द-दर-शब्द दोहराव है — पर यहाँ 'सत्यं ते प्रतिजाने' और 'प्रियोऽसि मे' जुड़े हैं। यह दोहराव जानबूझकर है।

18.65 और 18.66 (सर्वधर्मान् परित्यज्य) — ये दोनों मिलकर गीता के हृदय-कमल के दो दल हैं।

अध्याय 18 · 65 / 78
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