भगवान कहते हैं — हे कौन्तेय, सहज कर्म — जो स्वभाव से आता है — वह दोषयुक्त हो तो भी नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी दोष से ढके होते हैं — जैसे आग धुएँ से।
कोई भी कर्म पूरी तरह शुद्ध नहीं। किसान खेत जोतता है — कुछ कीड़े-मकोड़े मरते हैं। यह दोष है। पर इसीलिए खेती नहीं छोड़ी जाती। सब कर्म धुएँ से ढकी आग जैसे हैं।