📿 श्लोक संग्रह

सहजं कर्म कौन्तेय

गीता 18.48 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥
सहजम्
सहज — स्वभाव से उत्पन्न
सदोषम् अपि
दोषयुक्त हो तो भी
न त्यजेत्
नहीं छोड़ना चाहिए
सर्वारम्भाः
सब कार्यों के आरंभ
दोषेण
दोष से
धूमेन अग्निः इव
जैसे आग धुएँ से
आवृताः
ढके हुए हैं

भगवान कहते हैं — हे कौन्तेय, सहज कर्म — जो स्वभाव से आता है — वह दोषयुक्त हो तो भी नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी दोष से ढके होते हैं — जैसे आग धुएँ से।

कोई भी कर्म पूरी तरह शुद्ध नहीं। किसान खेत जोतता है — कुछ कीड़े-मकोड़े मरते हैं। यह दोष है। पर इसीलिए खेती नहीं छोड़ी जाती। सब कर्म धुएँ से ढकी आग जैसे हैं।

यह उपमा — 'धूमेन अग्निः' — बहुत सुंदर है। आग अपना काम करती है — दोष (धुआँ) के बावजूद। ऐसे ही मनुष्य को अपना कर्म करना चाहिए।

यह श्लोक पूर्णतावाद (perfectionism) के विरुद्ध गीता का उत्तर है — दोषरहित कर्म संभव नहीं। इसीलिए सहज कर्म करते रहो।

अध्याय 18 · 48 / 78
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