📿 श्लोक संग्रह

असक्तबुद्धिः सर्वत्र

गीता 18.49 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
असक्तबुद्धिः
अनासक्त बुद्धि वाला — आसक्ति-रहित
सर्वत्र
सब जगह
जितात्मा
आत्मा को जीतने वाला — स्वयं को वश में किया हुआ
विगतस्पृहः
इच्छाओं से मुक्त
नैष्कर्म्यसिद्धिम्
निष्काम सिद्धि — कर्म-रहितता की सिद्धि
परमाम्
परम — सर्वोच्च
संन्यासेन
संन्यास से — त्याग से

भगवान कहते हैं — जिसकी बुद्धि सब जगह अनासक्त है, जिसने स्वयं को जीत लिया है, जो इच्छाओं से रहित है — वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त करता है।

नैष्कर्म्य का अर्थ है — कर्म करते हुए भी कर्म से अलिप्त रहना। यह सिद्धि का सर्वोच्च रूप है। इसे संन्यास — मन और बुद्धि के त्याग — से प्राप्त किया जाता है।

'जितात्मा' — जिसने आत्मा को जीत लिया — यह पूरे गीता में बार-बार आने वाला आदर्श है। आत्म-जय ही सबसे बड़ी जीत है।

यह श्लोक संन्यास और कर्मयोग के बीच का सेतु है। यहाँ संन्यास का अर्थ भौतिक त्याग नहीं, बल्कि मन की अनासक्ति है।

अध्याय 18 · 49 / 78
अध्याय 18 · 49 / 78 अगला →