भगवान वही बात दोहराते हैं जो तीसरे अध्याय (3.35) में कही थी — अपना धर्म भले ही कमजोर हो, पर दूसरे के सुंदर धर्म से श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करने से पाप नहीं लगता।
यह शिक्षा हमें याद दिलाती है — दूसरों का काम देखकर ललचाना नहीं। अपना काम, अपनी क्षमता — यही साधना का आधार है।