📿 श्लोक संग्रह

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः

गीता 18.47 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
श्रेयान्
श्रेष्ठ — बेहतर
स्वधर्मः
अपना धर्म — स्वकर्म
विगुणः
गुणहीन — कमजोर भी हो
परधर्मात्
दूसरे के धर्म से
स्वनुष्ठितात्
भले ही वह अच्छी तरह पालन हो
स्वभावनियतम्
स्वभाव से नियत — प्रकृति से निर्धारित
किल्बिषम्
पाप — दोष

भगवान वही बात दोहराते हैं जो तीसरे अध्याय (3.35) में कही थी — अपना धर्म भले ही कमजोर हो, पर दूसरे के सुंदर धर्म से श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करने से पाप नहीं लगता।

यह शिक्षा हमें याद दिलाती है — दूसरों का काम देखकर ललचाना नहीं। अपना काम, अपनी क्षमता — यही साधना का आधार है।

यह श्लोक गीता 3.35 का पुनरावर्तन है — 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।' यहाँ फिर उसी शिक्षा को दृढ़ किया गया है।

अठारहवें अध्याय के इस भाग में स्वकर्म और स्वधर्म को मोक्ष-मार्ग से जोड़ा गया है।

अध्याय 18 · 47 / 78
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