📿 श्लोक संग्रह

यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्

गीता 18.46 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
यतः प्रवृत्तिः
जिससे उत्पत्ति है — जिससे प्रकट होता है
भूतानाम्
सब प्राणियों की
येन सर्वम् इदम् ततम्
जिससे यह सब व्याप्त है
स्वकर्मणा
अपने कर्म से
तम् अभ्यर्च्य
उसकी पूजा करके
सिद्धिम् विन्दति
सिद्धि प्राप्त करता है

भगवान एक बड़ी शिक्षा देते हैं — जिस परमात्मा से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है, जो सब में व्याप्त है — उसी की पूजा अपने कर्म के माध्यम से करो। इसी से सिद्धि मिलती है।

यह गीता का सबसे व्यापक उपदेश है — पूजा केवल मंदिर में नहीं होती। जो किसान खेत जोतता है ईमानदारी से, जो माँ बच्चे की देखभाल करती है प्रेम से — वे भी परमात्मा की पूजा कर रहे हैं।

'येन सर्वमिदं ततम्' — जो सब में व्याप्त है — यह गीता 10.38 और उपनिषदों के 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' की ध्वनि है।

स्वकर्म को पूजा मानना — यह गीता की कर्मयोग की पराकाष्ठा है। यहाँ काम और भक्ति एक हो जाते हैं।

अध्याय 18 · 46 / 78
अध्याय 18 · 46 / 78 अगला →