📿 श्लोक संग्रह

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः

गीता 18.45 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥
स्वे स्वे कर्मणि
अपने-अपने कर्म में
अभिरतः
तत्पर — प्रसन्नतापूर्वक लगा हुआ
संसिद्धिम्
पूर्ण सिद्धि — परिपूर्णता
लभते
प्राप्त करता है
स्वकर्मनिरतः
अपने कर्म में लगा हुआ
यथा विन्दति
जैसे पाता है — कैसे प्राप्त करता है

भगवान कहते हैं — अपने-अपने कर्म में तत्पर रहने वाला मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। और वह सिद्धि कैसे मिलती है — वह भी सुनो।

यह शिक्षा बहुत व्यावहारिक है। हर काम महान है जब वह पूरी तत्परता से किया जाए। किसान, कारीगर, शिक्षक — सब अपने काम में पूर्ण होकर सिद्धि पा सकते हैं।

'अभिरतः' — केवल काम करना नहीं, बल्कि प्रसन्नतापूर्वक, रुचि से काम करना। यही सिद्धि की कुंजी है।

अगला श्लोक (18.46) बताएगा — स्वकर्म के माध्यम से भगवान की पूजा कैसे होती है।

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