वैश्य का स्वाभाविक कर्म है — कृषि, गोरक्षा और व्यापार। शूद्र का स्वाभाविक कर्म है — सेवा। गीता हर वर्ण के कर्म को समान आदर से देखती है।
यहाँ 'स्वभावजम्' — स्वभाव से उत्पन्न — शब्द दोनों के लिए एक जैसा प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि सभी कर्म समान रूप से महत्वपूर्ण हैं — अपने स्वभाव के अनुसार।