📿 श्लोक संग्रह

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यम्

गीता 18.44 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥
कृषि
खेती — कृषि
गौरक्ष्यम्
गोरक्षा — पशुपालन
वाणिज्यम्
व्यापार — वाणिज्य
वैश्यकर्म
वैश्य का कर्म
परिचर्यात्मकम्
सेवा-स्वभाव वाला
शूद्रस्य
शूद्र का
स्वभावजम्
स्वभाव से उत्पन्न

वैश्य का स्वाभाविक कर्म है — कृषि, गोरक्षा और व्यापार। शूद्र का स्वाभाविक कर्म है — सेवा। गीता हर वर्ण के कर्म को समान आदर से देखती है।

यहाँ 'स्वभावजम्' — स्वभाव से उत्पन्न — शब्द दोनों के लिए एक जैसा प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि सभी कर्म समान रूप से महत्वपूर्ण हैं — अपने स्वभाव के अनुसार।

गीता की दृष्टि में कोई भी कर्म 'छोटा' नहीं। किसान का खेती करना उतना ही श्रेष्ठ है जितना ब्राह्मण का अध्ययन — बशर्ते वह स्वभाव से हो।

अगले श्लोक (18.45) में भगवान बताएँगे — अपने कर्म में तत्पर रहने से मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।

अध्याय 18 · 44 / 78
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