📿 श्लोक संग्रह

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यम्

गीता 18.43 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥
शौर्यम्
शौर्य — वीरता
तेजः
तेज — ओज, प्रताप
धृतिः
दृढ़ता — स्थिरता
दाक्ष्यम्
दक्षता — कुशलता
अपलायनम्
न भागना — युद्ध-पलायन न करना
दानम्
दान
ईश्वरभावः
शासन-क्षमता — स्वामित्व का भाव
क्षात्रम्
क्षत्रिय का — राजसी

क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं — वीरता, प्रताप, दृढ़ता, कुशलता, युद्ध में पीठ न दिखाना, दान और नेतृत्व का भाव। ये सात गुण क्षत्रिय-धर्म के आधार हैं।

यहाँ भी ध्यान देने योग्य है — 'दान' क्षत्रिय के कर्म में भी है। सेवा और दान केवल किसी एक वर्ण की विशेषता नहीं।

'अपलायन' — युद्ध में न भागना — यह क्षत्रिय का सबसे महत्वपूर्ण धर्म है। यही अर्जुन के संदर्भ में सबसे प्रासंगिक है।

'ईश्वरभाव' यहाँ स्वामित्व या नेतृत्व की क्षमता है — लोगों की रक्षा और पालन का भाव।

अध्याय 18 · 43 / 78
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