ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं — मन का संयम, इंद्रिय-संयम, तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान (अनुभव-ज्ञान) और ईश्वर में आस्था। ये नौ गुण ब्राह्मण-धर्म के आधार हैं।
ये गुण किसी जाति की संपत्ति नहीं — ये स्वभाव के गुण हैं। जिस व्यक्ति में ये गुण हों, वह ब्राह्मण-कर्म करने योग्य है। यह गीता की दृष्टि है।