भगवान कहते हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त हैं। यह विभाजन जन्म से नहीं, बल्कि प्रकृति और गुणों से है।
गीता यहाँ यह स्पष्ट करती है — हर व्यक्ति का कर्म उसके स्वभाव से निर्धारित होता है। यह स्वभाव गुणों का परिणाम है। इसीलिए अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना श्रेष्ठ है।