📿 श्लोक संग्रह

धृत्या यया धारयते

गीता 18.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
धृत्या
धृति से — दृढ़ता से
धारयते
थामे रखती है — नियंत्रित करती है
मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः
मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाएँ
योगेन
योग से — अभ्यास से
अव्यभिचारिण्या
कभी न हटने वाली — अचल
सात्त्विकी
सात्त्विक धृति

सात्त्विक धृति वह अचल दृढ़ता है जो योग-अभ्यास से मन, प्राण और इंद्रियों को साधे रखती है। यह धृति कभी डिगती नहीं।

धृति — यानी भीतरी दृढ़ता — जब योग से जुड़ती है, तो मन भटकता नहीं, इंद्रियाँ भागती नहीं, प्राण विचलित नहीं होता। यही सात्त्विक धृति की शक्ति है।

'अव्यभिचारिणी' — जो कभी नहीं टूटती — यह शब्द सात्त्विक धृति की विशेषता है। यह संकट में भी स्थिर रहती है।

धृति को गीता में विशेष महत्व दिया गया है। यह केवल 'इच्छाशक्ति' नहीं — यह आत्मा की स्थिरता है।

अध्याय 18 · 33 / 78
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