📿 श्लोक संग्रह

अधर्मं धर्ममिति या

गीता 18.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥
अधर्मम् धर्मम् इति
अधर्म को धर्म — ऐसा मानना
तमसा आवृता
अंधकार से ढकी — तमोगुण से आच्छादित
सर्वार्थान्
सब बातों को
विपरीतान्
उल्टा — विपरीत
तामसी
तामस बुद्धि

तामस बुद्धि तमोगुण से ढकी हुई है। वह अधर्म को धर्म माने, और सब बातों को उल्टा देखे। यह बुद्धि की सबसे निम्न अवस्था है — जहाँ सही-गलत का भेद ही मिट जाता है।

इस बुद्धि वाला व्यक्ति गलत काम करता है पर उसे सही मानता है। उसे कोई अपराध-बोध नहीं होता। यह अज्ञान की सबसे गहरी अवस्था है।

तमोगुण जब बुद्धि को ढक लेता है, तो विवेक नष्ट हो जाता है। यही कारण है कि तामस बुद्धि को सबसे खतरनाक कहा गया है।

बुद्धि की तीन श्रेणियाँ समाप्त हुईं। अगले श्लोकों (18.33-35) में धृति — दृढ़ता — के तीन प्रकार आएँगे।

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