📿 श्लोक संग्रह

यया तु धर्मकामार्थान्

गीता 18.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥
धर्मकामार्थान्
धर्म, काम और अर्थ को
प्रसङ्गेन
आसक्ति के साथ — लगाव से
फलाकाङ्क्षी
फल की कामना से
धारयते
धारण करता है — थामे रखता है
राजसी
राजस धृति

राजस धृति वह है जो धर्म, काम और अर्थ — इन तीनों को फल की आसक्ति के साथ धारण करे। यह धृति है — दृढ़ता है — पर उसका उद्देश्य फल पाना है।

यह धृति बुरी नहीं — पर अधूरी है। जो व्यक्ति धर्म इसलिए पालता है कि उसे पुण्य मिले, या काम इसलिए करता है कि उसे लाभ हो — उसकी धृति राजस है।

धर्म, काम, अर्थ — ये तीनों पुरुषार्थ वैदिक जीवन के अंग हैं। पर जब इन्हें फल की आसक्ति से धारण किया जाए, तो दृढ़ता राजस बन जाती है।

सात्त्विक धृति बिना फल की इच्छा के योग-मार्ग पर चलती है। राजस धृति फल के लिए चलती है। यही दोनों का अंतर है।

अध्याय 18 · 34 / 78
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