📿 श्लोक संग्रह

अयुक्तः प्राकृतः

गीता 18.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥
अयुक्तः
अस्थिर — असंयत
प्राकृतः
अशिक्षित — साधारण बुद्धि वाला
स्तब्धः
हठी — अकड़ा हुआ
शठः
धोखेबाज — कपटी
नैष्कृतिकः
दुष्ट — दूसरों को कष्ट देने वाला
विषादी
उदास — विषाद में रहने वाला
दीर्घसूत्री
देर करने वाला — टालमटोल करने वाला

तामस कर्ता में सात लक्षण गिनाए गए हैं — असंयत, संकीर्ण बुद्धि, हठी, कपटी, दुष्ट, उदास, और काम टालने वाला। यह व्यक्ति न स्वयं आगे बढ़ पाता है, न दूसरों को बढ़ने देता है।

'दीर्घसूत्री' — लंबे सूत्र वाला — यानी जो हर काम को खींचता-टालता रहता है। आज का काम कल, कल का काम परसों — यह तामस कर्ता की पहचान है।

ये लक्षण प्रत्येक मनुष्य में कम-ज्यादा होते हैं। गीता इन्हें पहचानने के लिए कह रही है — ताकि इनसे बाहर निकला जा सके।

कर्ताओं की तीन श्रेणियाँ यहाँ समाप्त होती हैं। अगले श्लोकों में बुद्धि (18.29-32) और धृति (18.33-35) की श्रेणियाँ आएँगी।

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