📿 श्लोक संग्रह

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव

गीता 18.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥
बुद्धेः भेदम्
बुद्धि का भेद — बुद्धि के प्रकार
धृतेः च एव
और धृति का भी
गुणतः
गुणों के अनुसार
त्रिविधम्
तीन प्रकार का
अशेषेण
पूरी तरह — शेष छोड़े बिना
पृथक्त्वेन
अलग-अलग करके
धनंजय
धन जीतने वाले — अर्जुन

भगवान कहते हैं — हे धनंजय, अब बुद्धि और धृति के भेद को भी गुणों के अनुसार तीन-तीन प्रकार में सुनो। यह पूरी तरह और अलग-अलग बताया जाएगा।

गीता का यह भाग बहुत व्यवस्थित है। ज्ञान, कर्म, कर्ता — हो गए। अब बुद्धि और धृति। और अंत में सुख। यह पूरा गुण-विवेचन का एक सुंदर ढाँचा है।

बुद्धि — वह शक्ति जो निर्णय लेती है, सही-गलत जानती है। धृति — वह शक्ति जो मन, प्राण और इंद्रियों को थामे रखती है।

ये दोनों शक्तियाँ जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। गीता इनके तीन स्तरों को स्पष्ट करती है।

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