📿 श्लोक संग्रह

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च

गीता 18.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
प्रवृत्तिम्
लगने योग्य — करने का मार्ग
निवृत्तिम्
हटने योग्य — न करने का मार्ग
कार्याकार्ये
करने और न करने योग्य को
भयाभये
भय और अभय को
बन्धम् मोक्षम्
बंधन और मोक्ष को
वेत्ति
जानती है — पहचानती है
सात्त्विकी
सात्त्विक बुद्धि

सात्त्विक बुद्धि वह है जो जानती है — कब प्रवृत्त होना है, कब हटना है; क्या करना उचित है, क्या नहीं; कहाँ भय है, कहाँ निडरता; क्या बंधन है, क्या मुक्ति।

यह बुद्धि जीवन की हर परिस्थिति में सही निर्णय लेती है। वह न भटकती है, न घबराती है। यही सात्त्विक बुद्धि का वरदान है।

'भय-अभय' और 'बंधन-मोक्ष' — ये दो जोड़े बहुत महत्वपूर्ण हैं। जो बुद्धि इन्हें सही पहचाने, वही आत्म-ज्ञान की ओर ले जाती है।

गीता के दूसरे अध्याय में 'व्यवसायात्मिका बुद्धि' का उल्लेख था — वह और यह सात्त्विक बुद्धि एक ही है।

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