📿 श्लोक संग्रह

रागी कर्मफलप्रेप्सुः

गीता 18.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥
रागी
राग से युक्त — आसक्त
कर्मफलप्रेप्सुः
कर्म-फल की कामना करने वाला
लुब्धः
लोभी — लालची
हिंसात्मकः
हिंसक प्रकृति का
अशुचिः
अपवित्र — अशुद्ध
हर्षशोकान्वितः
हर्ष और शोक से ग्रस्त
राजसः
राजस — रजोगुण से युक्त

राजस कर्ता में छह लक्षण होते हैं — राग, फल की इच्छा, लोभ, हिंसक प्रवृत्ति, अशुद्धता, और हर्ष-शोक में डूबा रहना। ऐसा व्यक्ति काम तो बहुत करता है, पर शांति नहीं पाता।

हर्ष-शोक का होना राजस कर्ता की पहचान है। जब फल मिलता है — खुश होता है। नहीं मिलता — दुखी होता है। यह उतार-चढ़ाव ही उसका बंधन है।

राजस कर्ता बुरा इंसान नहीं है — बस अधूरा है। उसमें ऊर्जा है, प्रयास है — पर दिशा अभी सही नहीं हुई।

गीता यहाँ किसी की निंदा नहीं करती — बस दर्पण दिखाती है। जो इसमें अपना चेहरा देखे, वह सुधर सकता है।

अध्याय 18 · 27 / 78
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