📿 श्लोक संग्रह

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्

गीता 18.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥
कृत्स्नवत्
सब कुछ है जैसे — संपूर्ण मानकर
एकस्मिन् कार्ये
एक कार्य में
सक्तम्
आसक्त — चिपका हुआ
अहैतुकम्
कारण न देखने वाला — तर्कहीन
अतत्त्वार्थवत्
तत्त्व का अर्थ न जानने वाला
अल्पम्
तुच्छ — सीमित
तामसम्
तामस — तमोगुण से युक्त

तामस ज्ञान वह है जो एक छोटी-सी चीज में आसक्त हो जाए और उसे ही सब कुछ माने। वह न कारण देखता है, न तत्त्व जानता है। यह बहुत संकीर्ण और तुच्छ ज्ञान है।

जैसे कोई केवल अपने घर, अपने परिवार, अपने स्वार्थ को ही सब कुछ माने — आगे कुछ न सोचे, पूछे नहीं, जिज्ञासा न हो — यह तामस ज्ञान की झलक है।

तीन ज्ञानों में तामस ज्ञान सबसे संकीर्ण है। यह न एकता देखता है (सात्त्विक), न विविधता (राजस) — बस एक टुकड़े को पकड़े बैठता है।

यह ज्ञान नहीं, अज्ञान की एक भिन्न अवस्था है। इसीलिए इसे 'अतत्त्वार्थवत्' — तत्त्व से रहित — कहा गया है।

अध्याय 18 · 22 / 78
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