सात्त्विक कर्म वह है जो नियत हो — जो करना ही है — और जो बिना आसक्ति, बिना राग-द्वेष, और बिना फल की चाह के किया जाए। यह कर्म का सबसे शुद्ध रूप है।
सात्त्विक कर्म में तीन 'बिना' हैं — बिना आसक्ति, बिना राग-द्वेष, बिना फल-इच्छा। जब ये तीनों नहीं होते, तो कर्म मुक्त करता है, बांधता नहीं।