📿 श्लोक संग्रह

नियतं सङ्गरहितम्

गीता 18.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥
नियतम्
नियत — नियत कर्तव्य
सङ्गरहितम्
आसक्ति-रहित
अरागद्वेषतः
राग और द्वेष के बिना
कृतम्
किया गया
अफलप्रेप्सुना
फल की इच्छा न रखने वाले द्वारा
सात्त्विकम्
सात्त्विक — सत्त्वगुण से युक्त

सात्त्विक कर्म वह है जो नियत हो — जो करना ही है — और जो बिना आसक्ति, बिना राग-द्वेष, और बिना फल की चाह के किया जाए। यह कर्म का सबसे शुद्ध रूप है।

सात्त्विक कर्म में तीन 'बिना' हैं — बिना आसक्ति, बिना राग-द्वेष, बिना फल-इच्छा। जब ये तीनों नहीं होते, तो कर्म मुक्त करता है, बांधता नहीं।

यह श्लोक गीता की निष्काम कर्म की परिभाषा को कर्म की श्रेणी में रखता है। ज्ञान के बाद अब कर्म की तीन श्रेणियाँ शुरू होती हैं।

'अफलप्रेप्सु' — फल की आकांक्षा न रखने वाला — यह शब्द ही इस पूरे श्लोक की आत्मा है।

अध्याय 18 · 23 / 78
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