📿 श्लोक संग्रह

यत्तु कामेप्सुना कर्म

गीता 18.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥
कामेप्सुना
कामना करने वाले द्वारा — इच्छुक व्यक्ति द्वारा
साहंकारेण
अहंकार सहित
बहुलायासम्
बहुत अधिक प्रयास से — श्रम-प्रधान
राजसम्
राजस — रजोगुण से युक्त
उदाहृतम्
कहा गया है — बताया गया है

राजस कर्म वह है जो कामना से किया जाए — 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह मिलना चाहिए' — या जो अहंकार के साथ किया जाए — 'मैं यह कर रहा हूँ।' ऐसे कर्म में बहुत प्रयास और तनाव होता है।

राजस कर्म बुरा नहीं — पर यह बांधता है। जब हम किसी काम में 'मेरा' और 'मुझे' बहुत अधिक हो जाता है, तो वह कर्म बोझिल हो जाता है।

'बहुलायास' — बहुत अधिक श्रम — यहाँ शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि भीतरी तनाव और चिंता का संकेत है।

राजस कर्म करने वाले अक्सर थके हुए और असंतुष्ट रहते हैं — क्योंकि फल की चाह पूरी नहीं होती और अहंकार को चोट लगती है।

अध्याय 18 · 24 / 78
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