राजस ज्ञान वह है जो सब भूतों में भेद-भाव से अनेक-अनेक और भिन्न-भिन्न भावों को देखता है। यह ज्ञान विविधता तो देखता है, पर उस विविधता के पीछे की एकता नहीं पकड़ पाता।
हम जब किसी को 'वह अलग है, मैं अलग हूँ' — इस दृष्टि से देखते हैं, तो यह राजस ज्ञान है। यह गलत नहीं है — पर अधूरा है। इसमें सब दिखता है, पर मूल नहीं दिखता।