📿 श्लोक संग्रह

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता

गीता 18.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥
ज्ञानम्
ज्ञान — जानने की शक्ति
ज्ञेयम्
जानने योग्य वस्तु
परिज्ञाता
जानने वाला — ज्ञाता
त्रिविधा
तीन प्रकार की
कर्मचोदना
कर्म की प्रेरणा
करणम्
इंद्रियाँ — साधन
कर्मसंग्रहः
कर्म का आधार — कर्म-समुच्चय

भगवान बताते हैं — किसी भी कर्म को शुरू करने के लिए तीन चीजें चाहिए: ज्ञान (जानने की शक्ति), ज्ञेय (जो जाना जाए), और ज्ञाता (जो जाने)। ये तीनों मिलकर कर्म की प्रेरणा बनती हैं।

और कर्म को संपन्न करने के तीन आधार होते हैं: करण (इंद्रियाँ जो साधन हैं), कर्म (जो किया जाए), और कर्ता (जो करे)। यह विश्लेषण दर्शाता है कि कर्म एक जटिल प्रक्रिया है।

यह श्लोक दर्शन-शास्त्र की भाषा में है। पर इसका सार सीधा है — हर काम के पीछे एक जानकार (ज्ञाता), एक जानने की चीज (ज्ञेय), और एक करने वाला (कर्ता) होता है।

अगले श्लोकों में इन तीनों — ज्ञान, कर्म, कर्ता — को गुणों के आधार पर सात्त्विक, राजस और तामस में बाँटा जाएगा।

अध्याय 18 · 18 / 78
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