📿 श्लोक संग्रह

कट्वम्ललवणात्युष्ण

गीता 17.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥
कटु
कड़वा
अम्ल
खट्टा
लवण
नमकीन
अत्युष्ण
बहुत गर्म
तीक्ष्ण
तीखा
रूक्ष
रूखा / सूखा
विदाहिनः
जलन देने वाले
राजसस्य
राजसिक व्यक्ति को
इष्टाः
प्रिय
दुःखशोकामयप्रदाः
दुख, शोक और रोग देने वाले

भगवान कृष्ण बताते हैं कि राजसिक लोगों को जो भोजन प्रिय होता है, वह कड़वा, खट्टा, अत्यधिक नमकीन, बहुत गर्म, तीखा, रूखा और जलन पैदा करने वाला होता है। ऐसा भोजन दुख, शोक और रोग उत्पन्न करता है।

राजसिक भोजन वह है जो जीभ को तो अच्छा लगता है लेकिन शरीर और मन को कष्ट देता है। अत्यधिक मिर्च-मसालेदार खाना, बहुत तेज़ नमकीन चीज़ें, या बहुत गर्म खाना — ये सब इस श्रेणी में आते हैं।

ऐसा भोजन शरीर में बेचैनी पैदा करता है, पेट में जलन होती है, और मन चिड़चिड़ा हो जाता है। इसलिए भगवान कहते हैं कि यह भोजन दुख और रोग का कारण बनता है।

यह श्लोक राजसिक आहार का वर्णन करता है। पिछले श्लोक (17.8) में सात्त्विक और अगले श्लोक (17.10) में तामसिक आहार बताया गया है। तीनों मिलकर भोजन के संपूर्ण त्रिगुणात्मक वर्गीकरण को प्रस्तुत करते हैं।

आयुर्वेद में भी अत्यधिक तीखा, खट्टा और गर्म भोजन पित्त बढ़ाने वाला माना गया है, जो शरीर में सूजन और अशांति पैदा करता है।

अध्याय 17 · 9 / 28
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