भगवान कृष्ण बताते हैं कि तामसिक लोगों को जो भोजन प्रिय होता है, वह बासी, बेस्वाद, दुर्गंधयुक्त, सड़ा हुआ, जूठा और अपवित्र होता है। ऐसा भोजन शरीर और मन दोनों को दूषित करता है।
"यातयाम" शब्द का अर्थ है — जो बनने के बाद बहुत समय बीत चुका हो। ताज़ा बना भोजन सात्त्विक होता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, उसकी गुणवत्ता घटती जाती है। बासी, ठंडा, सड़ने लगा खाना तमोगुण बढ़ाता है।
यह शिक्षा बहुत व्यावहारिक है — ताज़ा और शुद्ध भोजन खाना केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास के लिए भी आवश्यक है। भोजन का सीधा प्रभाव हमारे विचारों और मन की स्थिति पर पड़ता है।