📿 श्लोक संग्रह

आयुःसत्त्वबलारोग्य

गीता 17.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥
आयुः
आयु
सत्त्व
शक्ति / सत्त्वगुण
बल
बल
आरोग्य
स्वास्थ्य
सुखप्रीतिविवर्धनाः
सुख-प्रसन्नता बढ़ाने वाले
रस्याः
रसीले
स्निग्धाः
चिकने / तैलयुक्त
स्थिराः
टिकाऊ / देर तक ठहरने वाले
हृद्याः
हृदय को भाने वाले
सात्त्विकप्रियाः
सात्त्विक लोगों को प्रिय

भगवान कृष्ण बताते हैं कि सात्त्विक लोगों को जो भोजन प्रिय होता है, वह आयु, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाला होता है। ऐसा भोजन रसीला, चिकना, देर तक शरीर में ठहरने वाला और हृदय को प्रसन्न करने वाला होता है।

सरल शब्दों में कहें तो — ताज़ा पका हुआ भोजन, दूध, फल, अनाज, शुद्ध घी, मौसमी सब्ज़ियाँ — ये सब सात्त्विक आहार हैं। ऐसा भोजन शरीर को पोषण देता है, मन को शांत रखता है और बुद्धि को तेज़ करता है।

दादी-नानी जो घर का बना ताज़ा खाना परोसती हैं — वही सात्त्विक आहार का सबसे सुंदर उदाहरण है। यह भोजन शरीर और मन दोनों का पोषण करता है।

यह श्लोक सात्त्विक आहार का वर्णन करता है। अगले दो श्लोकों (17.9 और 17.10) में राजसिक और तामसिक आहार बताए जाएँगे। तीनों मिलकर आहार का पूर्ण त्रिगुणात्मक वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं।

आयुर्वेद और योग परंपरा में भी भोजन के इसी प्रकार के वर्गीकरण का उपयोग किया जाता है।

अध्याय 17 · 8 / 28
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