📿 श्लोक संग्रह

अशास्त्रविहितं घोरं

गीता 17.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
अशास्त्रविहितम्
शास्त्र में न बताया गया
घोरम्
भयंकर
तप्यन्ते
तप करते हैं
ये
जो
तपः
तपस्या
जनाः
लोग
दम्भ
पाखंड
अहङ्कार
घमंड
संयुक्ताः
से युक्त
कामरागबलान्विताः
काम, आसक्ति और बल से भरे

भगवान कृष्ण यहाँ उन लोगों की बात करते हैं जो शास्त्रों में बताई गई विधि को छोड़कर अपनी मनमानी से भयंकर तपस्या करते हैं। ये लोग पाखंड और अहंकार से भरे होते हैं — उनका उद्देश्य आत्मशुद्धि नहीं, बल्कि दिखावा और अपनी इच्छाओं की पूर्ति होता है।

ऐसे लोग काम, आसक्ति और बल के वशीभूत होकर घोर तप करते हैं। जैसे कोई व्यक्ति उपवास इसलिए नहीं करता कि मन शुद्ध हो, बल्कि इसलिए करता है कि लोग उसे महान समझें — यह दम्भ है।

भगवान स्पष्ट करते हैं कि केवल कठोर तपस्या करना पर्याप्त नहीं है — उसके पीछे की भावना शुद्ध होनी चाहिए। यह श्लोक और अगला श्लोक (17.6) एक साथ पढ़ने चाहिए।

श्लोक 17.5 और 17.6 मिलकर एक पूरा विषय प्रस्तुत करते हैं — अशास्त्रीय तपस्या की निंदा। भगवान यहाँ चेतावनी देते हैं कि बिना सद्बुद्धि के किया गया तप हानिकारक होता है।

यह शिक्षा आज भी प्रासंगिक है — जहाँ कई लोग स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले कठोर व्रत या तप दिखावे के लिए करते हैं।

अध्याय 17 · 5 / 28
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