📿 श्लोक संग्रह

देवद्विजगुरुप्राज्ञ

गीता 17.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥
देव
देवताओं का
द्विज
विद्वानों का
गुरु
गुरु का
प्राज्ञ
ज्ञानियों का
पूजनम्
पूजन
शौचम्
पवित्रता
आर्जवम्
सरलता
ब्रह्मचर्यम्
ब्रह्मचर्य
अहिंसा
अहिंसा
शारीरम्
शरीर संबंधी
तपः
तपस्या

भगवान कृष्ण अब तपस्या के तीन प्रकार बताते हैं — शारीरिक, वाचिक और मानसिक। यह श्लोक शारीरिक तप का वर्णन करता है।

शारीरिक तप में शामिल हैं — देवताओं, विद्वानों, गुरुओं और ज्ञानी पुरुषों की सेवा-पूजा करना; शरीर और मन की पवित्रता रखना; व्यवहार में सरलता और सीधापन; ब्रह्मचर्य का पालन; और किसी भी प्राणी को कष्ट न देना।

यह तपस्या कठिन नहीं है — बड़ों का सम्मान करना, साफ़-सुथरा रहना, सच्चा और सरल आचरण करना, संयम रखना और किसी को दुख न देना — ये सब शारीरिक तप हैं। हमारी दादी-नानी जो नित्य पूजा करती हैं, घर को पवित्र रखती हैं, सबकी सेवा करती हैं — वे बिना जाने शारीरिक तप ही कर रही हैं।

श्लोक 17.14, 17.15 और 17.16 — तीनों मिलकर तप के तीन आयामों का वर्णन करते हैं। शारीरिक (14), वाचिक (15) और मानसिक (16) — ये तप के तीन स्तर हैं।

भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि तपस्या का अर्थ शरीर को कष्ट देना नहीं है — बल्कि शरीर, वाणी और मन को अनुशासित रखना तपस्या है।

अध्याय 17 · 14 / 28
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