भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो यज्ञ विधि-रहित हो, जिसमें अन्नदान न हो, मंत्रोच्चारण न हो, दक्षिणा न दी जाए, और सबसे बड़ी बात — जिसमें श्रद्धा ही न हो — वह तामसिक यज्ञ कहलाता है।
तामसिक यज्ञ में कोई भी आवश्यक तत्व नहीं होता। न विधि है, न भाव है, न सेवा है, न समर्पण है। यह एक खोखला कर्मकांड है — बस करने के लिए किया जाता है, बिना किसी गहरी भावना के।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण दोष "श्रद्धाविरहित" होना है। बिना श्रद्धा के कोई भी कर्म निष्फल है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ का मूल श्रद्धा है — बाकी सब उसके अंग हैं।