भगवान कृष्ण बताते हैं कि वाणी की तपस्या क्या है — ऐसे वचन बोलना जो किसी को कष्ट न दें, जो सत्य हों, प्रिय हों और हितकारी हों। साथ ही शास्त्रों का स्वाध्याय करना — यह सब वाचिक तप है।
ध्यान दीजिए कि भगवान ने चार गुण बताए हैं — वाणी उद्वेग-रहित हो, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो। कभी-कभी सत्य कड़वा होता है, तो उसे प्रिय तरीक़े से कहना चाहिए। कभी प्रिय बात हितकारी नहीं होती, तो हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।
दादा-दादी जो बच्चों को प्यार से कहानियाँ सुनाते हैं, जो शाम को रामायण या गीता का पाठ करते हैं — वे वाचिक तप ही कर रहे हैं। मीठी वाणी और शास्त्र-पाठ — यही वाणी की सबसे सुंदर तपस्या है।