यह श्लोक पिछले श्लोक (17.5) को पूरा करता है। भगवान कहते हैं कि जो विवेकहीन लोग शरीर में स्थित पंचभूतों के समूह को — अर्थात अपने शरीर को — कष्ट देते हैं, और साथ ही शरीर के भीतर निवास करने वाले परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं, उन्हें आसुरी स्वभाव का समझो।
यह बहुत गहरी बात है — भगवान कहते हैं कि जब कोई अपने शरीर को अनावश्यक कष्ट देता है, तो वह केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि उसमें बसे परमात्मा को भी दुख देता है। शरीर ईश्वर का मंदिर है, उसे तोड़ना-मरोड़ना आसुरी कर्म है।
इसका अर्थ यह नहीं कि तपस्या नहीं करनी चाहिए — बल्कि तपस्या विवेकपूर्ण और शास्त्रसम्मत होनी चाहिए। अपने शरीर और मन को शुद्ध करने का मार्ग कठोरता से नहीं, सद्बुद्धि से मिलता है।