📿 श्लोक संग्रह

कर्शयन्तः शरीरस्थं

गीता 17.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥
कर्शयन्तः
कृश करते हुए
शरीरस्थम्
शरीर में स्थित
भूतग्रामम्
पंचभूतों के समूह को
अचेतसः
मूर्ख / विवेकहीन
माम्
मुझ (परमात्मा) को
और
अन्तःशरीरस्थम्
शरीर के भीतर स्थित
तान्
उन्हें
विद्धि
जानो
आसुरनिश्चयान्
आसुरी निश्चय वाले

यह श्लोक पिछले श्लोक (17.5) को पूरा करता है। भगवान कहते हैं कि जो विवेकहीन लोग शरीर में स्थित पंचभूतों के समूह को — अर्थात अपने शरीर को — कष्ट देते हैं, और साथ ही शरीर के भीतर निवास करने वाले परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं, उन्हें आसुरी स्वभाव का समझो।

यह बहुत गहरी बात है — भगवान कहते हैं कि जब कोई अपने शरीर को अनावश्यक कष्ट देता है, तो वह केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि उसमें बसे परमात्मा को भी दुख देता है। शरीर ईश्वर का मंदिर है, उसे तोड़ना-मरोड़ना आसुरी कर्म है।

इसका अर्थ यह नहीं कि तपस्या नहीं करनी चाहिए — बल्कि तपस्या विवेकपूर्ण और शास्त्रसम्मत होनी चाहिए। अपने शरीर और मन को शुद्ध करने का मार्ग कठोरता से नहीं, सद्बुद्धि से मिलता है।

श्लोक 17.5 और 17.6 मिलकर आसुरी तपस्या का वर्णन करते हैं। भगवान ने सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी संपत्ति का विस्तृत वर्णन किया था — यहाँ वे उसी विषय को तपस्या के संदर्भ में आगे बढ़ाते हैं।

अगले श्लोक से भगवान आहार के त्रिगुणात्मक विभाजन की ओर मुड़ते हैं।

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