📿 श्लोक संग्रह

यजन्ते सात्त्विका देवान्

गीता 17.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥
यजन्ते
पूजा करते हैं
सात्त्विकाः
सात्त्विक लोग
देवान्
देवताओं की
यक्षरक्षांसि
यक्ष और राक्षसों की
राजसाः
राजसिक लोग
प्रेतान्
प्रेतों को
भूतगणान्
भूतों के समूह को
अन्ये
अन्य
तामसाः
तामसिक
जनाः
लोग

भगवान कृष्ण यहाँ बताते हैं कि तीन प्रकार के लोग किसकी पूजा करते हैं। सात्त्विक लोग देवताओं की उपासना करते हैं — अर्थात वे प्रकाश, ज्ञान और कल्याण के प्रतीकों की ओर आकर्षित होते हैं।

राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं। यक्ष धन और भौतिक शक्ति के प्रतीक हैं, और राक्षस बल और आक्रामकता के। जो व्यक्ति केवल धन, सत्ता और प्रभुत्व चाहता है, उसकी श्रद्धा ऐसी ही शक्तियों की ओर जाती है।

तामसिक लोग प्रेतों और भूतों की उपासना करते हैं — अर्थात वे अंधकार, भय और जड़ता से जुड़ी शक्तियों में विश्वास रखते हैं। यह वर्गीकरण हमें अपनी श्रद्धा की दिशा पहचानने में सहायता करता है।

यह श्लोक श्रद्धा के त्रिगुणात्मक विभाजन का पहला व्यावहारिक उदाहरण है। भगवान बताते हैं कि व्यक्ति जिसकी पूजा करता है, वह उसके आंतरिक गुणों को दर्शाता है।

अगले श्लोकों में भगवान उन लोगों की बात करते हैं जो शास्त्र-विरुद्ध घोर तपस्या करते हैं।

अध्याय 17 · 4 / 28
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