भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो दान अनुचित स्थान और समय पर, अयोग्य पात्र को, बिना सम्मान के या अपमानपूर्वक दिया जाता है — वह तामसिक दान है।
तामसिक दान में हर तत्व उलटा होता है — स्थान ग़लत, समय ग़लत, पात्र अयोग्य, और सबसे बुरी बात — देने वाला लेने वाले का अपमान करता है। जैसे कोई किसी ज़रूरतमंद को तिरस्कार से कुछ फेंककर दे — यह तामसिक दान है।
दान देना अच्छा कर्म है, लेकिन उसमें सम्मान और विवेक होना चाहिए। बिना विवेक और सम्मान के दिया गया दान न देने वाले को संतोष देता है, न लेने वाले को।