भगवान कृष्ण अब अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण खंड की शुरुआत करते हैं। वे कहते हैं कि "ॐ तत् सत्" — यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (तीन नाम) है। इन्हीं तीन शब्दों से प्राचीन काल में वेद, यज्ञ और ब्राह्मण (ज्ञानी पुरुष) रचे गए।
"ॐ" सम्पूर्ण सृष्टि का मूल ध्वनि है — यह परमात्मा का प्रथम और प्रधान नाम है। "तत्" का अर्थ है "वह" — अर्थात वह परम सत्ता जो सबसे परे है। "सत्" का अर्थ है सत्य, शाश्वत, सद्भाव — जो कभी नष्ट नहीं होता।
ये तीन शब्द मिलकर ब्रह्म के तीन पक्षों को व्यक्त करते हैं। आगे के श्लोकों में भगवान इन तीनों शब्दों की अलग-अलग व्याख्या करेंगे।