📿 श्लोक संग्रह

यत्तु प्रत्युपकारार्थं

गीता 17.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥
यत्
जो
तु
परन्तु
प्रत्युपकारार्थम्
बदले में उपकार पाने के लिए
फलम्
फल को
उद्दिश्य
लक्ष्य करके
दीयते
दिया जाता है
परिक्लिष्टम्
कष्ट के साथ / अनिच्छा से
राजसम्
राजसिक

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो दान बदले में कुछ पाने की आशा से, या किसी फल की लालसा से, या फिर अनिच्छा और कष्ट के साथ दिया जाता है — वह राजसिक दान है।

राजसिक दान में तीन दोष होते हैं — प्रत्युपकार की आशा (कि यह व्यक्ति भविष्य में मेरा कोई काम करेगा), फल की इच्छा (कि इस दान से मुझे पुण्य या स्वर्ग मिलेगा), और अनिच्छा (कि देना तो पड़ रहा है, लेकिन मन नहीं है)।

"परिक्लिष्ट" शब्द बहुत सटीक है — जब कोई व्यक्ति दान देते समय मन ही मन कष्ट अनुभव करता है, या देने के बाद पछताता है, तो वह राजसिक दान है। सच्चा दान वही है जो सहज भाव से, बिना किसी अपेक्षा के दिया जाए।

यह श्लोक दान-विभाग का दूसरा भाग है। पिछले श्लोक (17.20) में सात्त्विक और अगले (17.22) में तामसिक दान बताया गया है।

गीता की शिक्षा यह है कि कर्म का मूल्य उसके पीछे की भावना से निर्धारित होता है — एक ही कार्य सात्त्विक, राजसिक या तामसिक हो सकता है, बस भाव बदल जाता है।

अध्याय 17 · 21 / 28
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