📿 श्लोक संग्रह

दातव्यमिति यद्दानं

गीता 17.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
दातव्यम्
देना कर्तव्य है
इति
ऐसा समझकर
दानम्
दान
दीयते
दिया जाता है
अनुपकारिणे
जो बदले में कुछ न कर सके
देशे
उचित स्थान पर
काले
उचित समय पर
पात्रे
योग्य पात्र को
सात्त्विकम्
सात्त्विक

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो दान "देना मेरा कर्तव्य है" — इस भावना से, ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो बदले में कुछ नहीं कर सकता, और वह उचित स्थान, उचित समय और योग्य पात्र को दिया जाता है — वह सात्त्विक दान है।

सात्त्विक दान की तीन विशेषताएँ हैं — पहली, इसमें कर्तव्य-भाव है, न कि दया या अहंकार; दूसरी, यह ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो इसका प्रतिदान नहीं कर सकता; तीसरी, देश, काल और पात्र का विचार किया जाता है।

जैसे कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति किसी ज़रूरतमंद बच्चे की पढ़ाई का ख़र्च उठाए, बिना किसी प्रतिदान की आशा से, केवल यह सोचकर कि यह उसका धर्म है — यही सात्त्विक दान है।

यह श्लोक दान-विभाग का आरंभ है। अगले दो श्लोकों (17.21 और 17.22) में राजसिक और तामसिक दान बताए जाएँगे।

"देश-काल-पात्र" का विचार भारतीय परंपरा में दान का एक मूलभूत सिद्धांत है — सही जगह, सही समय और सही व्यक्ति को दिया गया दान ही सार्थक होता है।

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