भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो तपस्या मूर्खतापूर्ण हठ से, अपने शरीर को कष्ट देकर, या दूसरों के विनाश के उद्देश्य से की जाती है — वह तामसिक तप है।
तामसिक तप में दो दोष हैं — पहला, व्यक्ति बिना समझ-बूझ के, केवल हठ के कारण अपने शरीर को अत्यधिक कष्ट देता है। दूसरा, कभी-कभी कोई व्यक्ति तपस्या इसलिए करता है कि उससे किसी शत्रु का अनिष्ट हो — यह और भी निंदनीय है।
इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ राक्षसों ने घोर तपस्या की, लेकिन उनका उद्देश्य लोककल्याण नहीं, बल्कि शक्ति प्राप्त करके दूसरों पर अत्याचार करना था। ऐसी तपस्या तामसिक है।