भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो तपस्या सत्कार, मान-सम्मान और पूजा पाने के लिए, तथा दिखावे के साथ की जाती है — वह राजसिक तप है। ऐसे तप का फल अस्थिर और क्षणिक होता है।
राजसिक तपस्वी का उद्देश्य आत्मशुद्धि नहीं, बल्कि लोगों से प्रशंसा और सम्मान पाना होता है। जैसे कोई व्यक्ति लंबा उपवास इसलिए रखे कि लोग उसे महान तपस्वी कहें — यह राजसिक तप है।
भगवान कहते हैं कि ऐसे तप का फल "चल" और "अध्रुव" होता है — अर्थात जब तक लोग सम्मान दें, तब तक अच्छा लगता है; जैसे ही सम्मान कम हो, निराशा आ जाती है। यह तप टिकाऊ नहीं होता।