📿 श्लोक संग्रह

सत्कारमानपूजार्थं

गीता 17.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥
सत्कार
आदर-सत्कार
मान
सम्मान
पूजार्थम्
पूजा पाने के लिए
तपः
तपस्या
दम्भेन
दिखावे से
क्रियते
किया जाता है
राजसम्
राजसिक
चलम्
अस्थिर
अध्रुवम्
क्षणिक / अनिश्चित

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो तपस्या सत्कार, मान-सम्मान और पूजा पाने के लिए, तथा दिखावे के साथ की जाती है — वह राजसिक तप है। ऐसे तप का फल अस्थिर और क्षणिक होता है।

राजसिक तपस्वी का उद्देश्य आत्मशुद्धि नहीं, बल्कि लोगों से प्रशंसा और सम्मान पाना होता है। जैसे कोई व्यक्ति लंबा उपवास इसलिए रखे कि लोग उसे महान तपस्वी कहें — यह राजसिक तप है।

भगवान कहते हैं कि ऐसे तप का फल "चल" और "अध्रुव" होता है — अर्थात जब तक लोग सम्मान दें, तब तक अच्छा लगता है; जैसे ही सम्मान कम हो, निराशा आ जाती है। यह तप टिकाऊ नहीं होता।

यह श्लोक तप के गुणात्मक विभाजन का दूसरा भाग है। "दम्भ" शब्द पुनः आया है — जैसे राजसिक यज्ञ (17.12) में दम्भ था, वैसे ही राजसिक तप में भी दम्भ प्रमुख दोष है।

अगले श्लोक (17.19) में तामसिक तप का वर्णन होगा।

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