📿 श्लोक संग्रह

अदेशकाले यद्दानम्

गीता 17.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
अदेशकाले
अनुचित स्थान और समय पर
दानम्
दान
अपात्रेभ्यः
अयोग्य पात्रों को
दीयते
दिया जाता है
असत्कृतम्
बिना सत्कार के
अवज्ञातम्
अपमान के साथ
तामसम्
तामसिक

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो दान अनुचित स्थान और समय पर, अयोग्य पात्र को, बिना सम्मान के या अपमानपूर्वक दिया जाता है — वह तामसिक दान है।

तामसिक दान में हर तत्व उलटा होता है — स्थान ग़लत, समय ग़लत, पात्र अयोग्य, और सबसे बुरी बात — देने वाला लेने वाले का अपमान करता है। जैसे कोई किसी ज़रूरतमंद को तिरस्कार से कुछ फेंककर दे — यह तामसिक दान है।

दान देना अच्छा कर्म है, लेकिन उसमें सम्मान और विवेक होना चाहिए। बिना विवेक और सम्मान के दिया गया दान न देने वाले को संतोष देता है, न लेने वाले को।

यह श्लोक दान-विभाग का तीसरा और अंतिम भाग है। श्लोक 17.20 (सात्त्विक), 17.21 (राजसिक) और 17.22 (तामसिक) — तीनों मिलकर दान का संपूर्ण वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं।

अगले श्लोक से अध्याय का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण खंड आरंभ होता है — "ॐ तत् सत्" का वर्णन।

अध्याय 17 · 22 / 28
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