भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो दान "देना मेरा कर्तव्य है" — इस भावना से, ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो बदले में कुछ नहीं कर सकता, और वह उचित स्थान, उचित समय और योग्य पात्र को दिया जाता है — वह सात्त्विक दान है।
सात्त्विक दान की तीन विशेषताएँ हैं — पहली, इसमें कर्तव्य-भाव है, न कि दया या अहंकार; दूसरी, यह ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो इसका प्रतिदान नहीं कर सकता; तीसरी, देश, काल और पात्र का विचार किया जाता है।
जैसे कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति किसी ज़रूरतमंद बच्चे की पढ़ाई का ख़र्च उठाए, बिना किसी प्रतिदान की आशा से, केवल यह सोचकर कि यह उसका धर्म है — यही सात्त्विक दान है।