भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो तपस्या (शारीरिक, वाचिक और मानसिक — तीनों प्रकार की) परम श्रद्धा के साथ, बिना फल की इच्छा रखे, योगी पुरुषों द्वारा की जाती है — उसे सात्त्विक तप कहते हैं।
सात्त्विक तप की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं — पहली, इसमें गहरी श्रद्धा होती है; दूसरी, इसमें किसी फल की लालसा नहीं होती। जो व्यक्ति केवल आत्मशुद्धि और ईश्वर-प्रेम से तप करता है, वही सात्त्विक तपस्वी है।
जैसे नदी बिना किसी स्वार्थ के बहती रहती है और सबको जल देती है — वैसे ही सात्त्विक तपस्वी बिना किसी अपेक्षा के अपना कर्तव्य निभाता रहता है।