📿 श्लोक संग्रह

श्रद्धया परया तप्तं

गीता 17.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥
श्रद्धया
श्रद्धा से
परया
परम / उत्तम
तप्तम्
तपा गया
तपः
तपस्या
तत्
वह
त्रिविधम्
तीन प्रकार का
नरैः
मनुष्यों द्वारा
अफलाकाङ्क्षिभिः
फल की इच्छा न रखने वाले
युक्तैः
योगी / समर्पित
सात्त्विकम्
सात्त्विक

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो तपस्या (शारीरिक, वाचिक और मानसिक — तीनों प्रकार की) परम श्रद्धा के साथ, बिना फल की इच्छा रखे, योगी पुरुषों द्वारा की जाती है — उसे सात्त्विक तप कहते हैं।

सात्त्विक तप की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं — पहली, इसमें गहरी श्रद्धा होती है; दूसरी, इसमें किसी फल की लालसा नहीं होती। जो व्यक्ति केवल आत्मशुद्धि और ईश्वर-प्रेम से तप करता है, वही सात्त्विक तपस्वी है।

जैसे नदी बिना किसी स्वार्थ के बहती रहती है और सबको जल देती है — वैसे ही सात्त्विक तपस्वी बिना किसी अपेक्षा के अपना कर्तव्य निभाता रहता है।

यह श्लोक तप के गुणात्मक विभाजन का आरंभ है। अगले दो श्लोकों (17.18 और 17.19) में राजसिक और तामसिक तप बताए जाएँगे।

ध्यान दें कि "अफलाकाङ्क्षिभिः" शब्द यज्ञ-विभाग (17.11) में भी आया था — निष्काम भाव सात्त्विकता की कसौटी है।

अध्याय 17 · 17 / 28
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