भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो यज्ञ शास्त्र-विधि के अनुसार, बिना किसी फल की इच्छा के, केवल "यह करना हमारा कर्तव्य है" — ऐसा मन में विचार करके किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है।
सात्त्विक यज्ञ में व्यक्ति किसी लाभ या प्रतिफल की आशा नहीं रखता। वह यज्ञ इसलिए नहीं करता कि उसे कोई विशेष वरदान मिले, बल्कि इसलिए करता है कि यह उसका धर्म है, यह शुभ कर्म है।
जैसे एक माँ अपने बच्चे की सेवा बिना किसी प्रतिदान की आशा से करती है — वही भाव सात्त्विक यज्ञ का है। कर्तव्य-भावना से किया गया कोई भी शुभ कर्म सात्त्विक यज्ञ के समान है।