📿 श्लोक संग्रह

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो

गीता 17.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥
अफलाकाङ्क्षिभिः
फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा
यज्ञः
यज्ञ
विधिदृष्टः
शास्त्र-विधि के अनुसार
इज्यते
किया जाता है
यष्टव्यम्
यज्ञ करना कर्तव्य है
एव
ही
इति
ऐसा
मनः
मन को
समाधाय
स्थिर करके
सात्त्विकः
सात्त्विक

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो यज्ञ शास्त्र-विधि के अनुसार, बिना किसी फल की इच्छा के, केवल "यह करना हमारा कर्तव्य है" — ऐसा मन में विचार करके किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है।

सात्त्विक यज्ञ में व्यक्ति किसी लाभ या प्रतिफल की आशा नहीं रखता। वह यज्ञ इसलिए नहीं करता कि उसे कोई विशेष वरदान मिले, बल्कि इसलिए करता है कि यह उसका धर्म है, यह शुभ कर्म है।

जैसे एक माँ अपने बच्चे की सेवा बिना किसी प्रतिदान की आशा से करती है — वही भाव सात्त्विक यज्ञ का है। कर्तव्य-भावना से किया गया कोई भी शुभ कर्म सात्त्विक यज्ञ के समान है।

यह श्लोक यज्ञ-विभाग का आरंभ है। अगले दो श्लोकों (17.12 और 17.13) में राजसिक और तामसिक यज्ञ बताए जाएँगे।

गीता में यज्ञ का अर्थ केवल हवन-कुंड नहीं है — किसी भी निष्काम सेवा या कर्तव्य-पालन को यज्ञ कहा गया है। यह निष्काम कर्मयोग का ही विस्तार है।

अध्याय 17 · 11 / 28
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