📿 श्लोक संग्रह

यातयामं गतरसं

गीता 17.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥
यातयामम्
बासी / तीन घंटे से अधिक पुराना
गतरसम्
स्वाद रहित
पूति
दुर्गंधयुक्त
पर्युषितम्
सड़ा हुआ
उच्छिष्टम्
जूठा
अमेध्यम्
अपवित्र
भोजनम्
भोजन
तामसप्रियम्
तामसिक लोगों को प्रिय

भगवान कृष्ण बताते हैं कि तामसिक लोगों को जो भोजन प्रिय होता है, वह बासी, बेस्वाद, दुर्गंधयुक्त, सड़ा हुआ, जूठा और अपवित्र होता है। ऐसा भोजन शरीर और मन दोनों को दूषित करता है।

"यातयाम" शब्द का अर्थ है — जो बनने के बाद बहुत समय बीत चुका हो। ताज़ा बना भोजन सात्त्विक होता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, उसकी गुणवत्ता घटती जाती है। बासी, ठंडा, सड़ने लगा खाना तमोगुण बढ़ाता है।

यह शिक्षा बहुत व्यावहारिक है — ताज़ा और शुद्ध भोजन खाना केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास के लिए भी आवश्यक है। भोजन का सीधा प्रभाव हमारे विचारों और मन की स्थिति पर पड़ता है।

यह श्लोक आहार-विभाग का तीसरा और अंतिम भाग है। श्लोक 17.8 (सात्त्विक), 17.9 (राजसिक) और 17.10 (तामसिक) — तीनों मिलकर भोजन का पूर्ण वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं।

अगले श्लोक से भगवान यज्ञ के त्रिगुणात्मक विभाजन की ओर मुड़ते हैं।

अध्याय 17 · 10 / 28
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