📿 श्लोक संग्रह

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च

गीता 16.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥
प्रवृत्तिम्
क्या करना चाहिए
और
निवृत्तिम्
क्या नहीं करना चाहिए
जनाः
लोग
न विदुः
नहीं जानते
आसुराः
आसुरी स्वभाव वाले
न शौचम्
न शुचिता
न आचारः
न सदाचार
न सत्यम्
न सत्य
तेषु
उनमें
विद्यते
होता है

अब आसुरी स्वभाव का विस्तृत वर्णन शुरू होता है। भगवान कहते हैं — आसुरी लोगों को न प्रवृत्ति का पता है, न निवृत्ति का। यानी उन्हें यह नहीं मालूम कि क्या करना उचित है और क्या नहीं करना चाहिए।

जब किसी को यह भेद ही न पता हो कि सही क्या है और गलत क्या है, तो वह कैसे अच्छा जीवन जी सकता है? यह अज्ञान ही सबसे बड़ी समस्या है।

ऐसे लोगों में न शौच (शरीर-मन की स्वच्छता) होती है, न सदाचार (अच्छा आचरण), और न सत्य। ये तीनों किसी भी अच्छे जीवन की बुनियाद हैं — और आसुरी व्यक्ति में इनका अभाव होता है।

श्लोक 16.7 से आसुरी स्वभाव का गहरा विश्लेषण शुरू होता है जो श्लोक 16.20 तक चलता है। प्रवृत्ति-निवृत्ति का ज्ञान भारतीय परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है — यही धर्म और अधर्म का मूल भेद है।

अध्याय 16 · 7 / 24
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