📿 श्लोक संग्रह

दैवी सम्पद्विमोक्षाय

गीता 16.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥
दैवी
दैवी (दिव्य)
सम्पत्
सम्पत्ति (गुण)
विमोक्षाय
मोक्ष के लिए
निबन्धाय
बन्धन के लिए
आसुरी
आसुरी (राक्षसी)
मता
मानी गई है
मा शुचः
शोक मत करो
सम्पदम् दैवीम्
दैवी सम्पत्ति
अभिजातः असि
तुम जन्मे हो
पाण्डव
हे अर्जुन

भगवान यहाँ दोनों सम्पदाओं का फल बताते हैं — दैवी गुण मोक्ष दिलाते हैं और आसुरी गुण बन्धन में डालते हैं। यह बहुत सीधी-सादी बात है — अच्छे गुण मुक्ति की ओर ले जाते हैं, बुरे गुण संसार के जाल में फँसाते हैं।

फिर भगवान अर्जुन को सांत्वना देते हैं — "मा शुचः" — शोक मत करो। तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो। यह सुनकर अर्जुन को कितना भरोसा मिला होगा!

हम सब भी अपने भीतर देखें — जिन गुणों की सूची पहले बताई गई, उनमें से कुछ तो हमारे पास भी हैं। बस उन्हें पहचानकर और बढ़ाना है।

यह श्लोक अध्याय का एक मोड़ है। पहले चार श्लोकों में गुणों की सूची थी, अब पाँचवें श्लोक में उनका फल बताया गया। आगे के श्लोकों में आसुरी स्वभाव का विस्तृत वर्णन होगा।

"मा शुचः" (शोक मत करो) — गीता में भगवान बार-बार अर्जुन को आश्वासन देते हैं। यह गुरु और शिष्य के बीच का स्नेहपूर्ण संवाद है।

अध्याय 16 · 5 / 24
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