सोलहवें अध्याय की शुरुआत में भगवान श्रीकृष्ण दैवी सम्पदा — यानी अच्छे गुणों — की सूची बताते हैं। सबसे पहले उन्होंने "अभय" कहा — निर्भयता। जो व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है, उसे किसी से डरने की जरूरत नहीं।
फिर आता है सत्त्वसंशुद्धि — मन और हृदय की भीतरी सफाई। जैसे घर को रोज़ साफ़ करते हैं, वैसे ही मन को भी पवित्र विचारों से साफ़ रखना चाहिए। ज्ञानयोग में स्थिति का अर्थ है — आत्मा और परमात्मा के ज्ञान में दृढ़ रहना।
दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये सब दैवी गुण हैं। ये गुण व्यक्ति को भीतर से मज़बूत और बाहर से विनम्र बनाते हैं।