📿 श्लोक संग्रह

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च

गीता 16.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥
दम्भः
पाखंड
दर्पः
घमंड
अभिमानः
अहंकार
और
क्रोधः
गुस्सा
पारुष्यम्
कठोर व्यवहार
अज्ञानम्
अज्ञान
अभिजातस्य
जन्मे हुए पुरुष की
पार्थ
हे अर्जुन
सम्पदम् आसुरीम्
आसुरी सम्पत्ति

अब भगवान आसुरी सम्पदा — बुरे गुणों — को बताते हैं। दम्भ — दिखावा करना, जो नहीं हो वह दिखाना। दर्प — धन, रूप या बल का घमंड। अभिमान — "मैं सबसे बड़ा हूँ" ऐसा सोचना।

क्रोध — बात-बात पर गुस्सा करना। पारुष्य — कठोर और कड़वे शब्द बोलना, दूसरों के साथ रूखा व्यवहार। अज्ञान — सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म का भेद न जानना।

भगवान कहते हैं — हे अर्जुन! ये छह दोष आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति में होते हैं। जहाँ दैवी गुणों की सूची लम्बी थी, वहाँ आसुरी गुण मात्र छह बताए — क्योंकि ये छह ही काफ़ी हैं व्यक्ति को नीचे गिराने के लिए।

दैवी सम्पदा के छब्बीस गुणों के बाद आसुरी सम्पदा के केवल छह गुण बताए गए हैं। यह अनुपात ही बताता है कि अच्छाई के रास्ते अनेक हैं, पर बुराई के मूल कारण गिने-चुने हैं।

इन छह दोषों में "अज्ञान" को अंत में रखा गया है — यह सबका मूल है। अज्ञान से ही दम्भ, दर्प और क्रोध उत्पन्न होते हैं।

अध्याय 16 · 4 / 24
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